शनिवार, ६ एप्रिल, २०१९

हनुमान जी की पत्नी सूवर्चला देवी की कथा





     मैरावनने भी अपने मित्र रावनके कार्य को करने की कसम ली।वह राम लक्ष्मण को बन्दी बनाकर पाताल ले जाकर कालिमाता को बलि देने वाला था।
      मैरावन तन्त्र ,मन्त्र, माया इ.विद्या में निपुण था।उसने अपनी तन्त्र विद्या एवं अन्य मायावी करतूतों से वानर सेनामेसे चुपचाप राम लक्ष्मण दोनों को बेहोश करके चुपचाप ही  उन्हें अपने राज्य पाताल ले गया।फिर उसने उनको वहां बन्दी बनाया।
           इधर जब वानर सेना में राम लक्ष्मण के एकाएक गायब होने से हलचलें मचगयि।तब जामवंत,हनुमान,सुग्रीव,अन्गद इ.वीर  परेशान हुए।पर यह कार्य रावन का मित्र मैरावन हि कर सकता है यह विभीषण जान गया।उसने यह बात वानर सेना को कहीं।उसने बताया की  मैरावन पाताल का राजा है।मायावी है।उसकी भी पाताल में पाताललन्का है।वहाँ जाने के लिए समुद्र में से निचे एक माया की बनी सुरन्ग है।इ.बातें जानने के बाद सेना में से हनुमान ही थे जो यह काम कर सकते थे।हनुमान समुद्र के अन्दर घुस गए और उन्होंने विभीषण के कहेनुसार मार्ग क्रमन किया।वे सुरन्गसे अनेक योजन निचे पाताल लोक पहुंचे।
         पाताल लन्का उन्होंने दुरसे देख ली।पर उस मायावी नगरी में प्रवेश करना कठिन था।एकमेव मुख्य द्वार से ही कोई अन्दर जा सकता था।जहां पहरेदार खड़े हुए थे।हनुमान जी ने उन्हें कुछ ही समय में खत्म किया।पर मुख्य द्वार न खोलपाए।
       तभी हनुमान जी को  हसने कि आवाज़ सुनाई दी।उनके सामने मुख्य द्वार रक्षक खड़ा हुआ।
     "मैं मुख्य द्वार रक्षक मत्स्य वल्लभ हूँ।तुम अन्दर नहीं जा सकते।"द्वार रक्षक बोल पड़ा।हनुमान जीने उसे देखा वे हैरान हुये,कि यह राक्षसी गुणों वाला नही हैं ,यह तो कोई सात्विक मनुष्य है।हनुमान जी ने अपना हठ न छोड़ा।यह देख मत्स्य वल्लभ ने अपना खड्ग हनुमान जी पर चलाने की कोशिश की।  हनुमान जी ने अपनी गदासे खड्ग के वार ताड लिए।दखते ही दोनों में युद्ध शुरू हुआ।
        उतने समय में वहां पर एक सुंदरयुवति पधारी एवं कहने लगी, "नहीं मत्स्य वल्लभ युद्ध रोक लो ।यह तुम्हारे पिता हनुमान हैं।" यह सुनकर मत्स्य वल्लभ से खड्ग छुट गया। उसने हनुमान जी को साष्टांग नमस्कार किया।परन्तु हनुमान जी बोले, " मैं ब्रह्मचर्य हूँ,मैंने कोई शादी नहीं की है,ब्रह्मचारी जीवन वाले व्यक्ति को यह बोल दोष देयक है,अपने यह शब्दों को वापस लो।मैं  समझ चुका,यह मैरावनकि मायावी तन्त्र,मन्त्र वाली पाताल नगरी है".
              हनुमान जी की बात सुनकर वह स्त्री रोने लगी।उसने कहा,"मैं दक्षिण सागर कन्या सुवर्चला हूँ ।मैं विशाल सागर मे मछली 🐟 के रूप लेकर विहार किया करती थी।तबकि बात है ,जब अापने सिंहिका के परछाईं खिचे जाने पर अापने सिंहिका का युद्ध करके वध किया।उसके कुछ क्षणों बाद अपने उन्गलियोसे पसीना निकाल कर छिडका था ,वह मैने मछली रूप में निगलने के कारणहि मुझे गर्भ रहा।यही  हमारा पुत्र मत्स्य वल्लभ है।जब मत्स्य वल्लभ का जन्म हुआ तभी से इस मैरावनने अपने तन्त्र विद्या से पाताल एवं समुद्र के जिवोको हरानकर छोडा है!"
      तभी वातावरण से आकाशवाणी हुई,"हे हनुमान सुवर्चला सत्य बोली हैं,मत्स्य वल्लभ तुम्हारा ही पुत्र हैं ,हम इस बात के साक्षी है!"
        हनुमान जी ने अपने पुत्र मत्स्य वल्लभ को सिनेसे लगाया।उसके बाद सुवर्चलाने कहाँ,"हनुमान जी,मैरावनने ही हमारा समुद्री जिवन विध्वंसक बनाया था इसी कारण हमारे पुत्र को नीतियाँ,धर्म,विद्या और युद्ध कलामे श्रेष्ठ होने के बावजूद यह द्वार रक्षा करनी पड़ी हैं।पर मुझे दिव्य दृष्टि से मालूम था,आपकी समय पर यहाँ भेंट होगी और हम समुद्र राज्य जाने के लिये मुक्त हो जाएंगे।"
       हनुमान जी ने भी,सुवर्चलासे आभार व्यक्त किये ।उन्होंने अपनी सारी कथा कही।
      तबहि सुवर्चलाने कहाँ की," ,मैरावनको उसकी तन्त्र शक्ति के कारन साधारण से कोई नहीं मार सकेगा,उसे मारने का उपाय केवल नागकन्या चन्द्रसेना ही जानती हैं।जो मैरावनके महल मे कैद है।आपको उसीसे मैरावनको मारनेका उपाय पूछना होगा! "
        इस प्रकार हनुमान जी अपनी पत्नी सुवर्चला से मिले।



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