कूरूप राजपूत्री और सेवा,उपकार का फल
कूरूप राजपूत्री और सेवा का फल
राजनंद राजा के राज्य शासन मे एक सरहद के पास जंगलो मे एक जादूगरणी रहा करती थी ।जिसका नाम जगताई था ।एक बार राजनंद राजा और रानी कमला रथ पर सवार जंगलो मे सैर कर रहे थे ।रानी कमला के पेट मे गर्भ था।जंगल मे अचानक उनके रथपर चिता कूद पडा।जब तक राजा ने चितेको मारा तबतक रानी बहोत घायल हो चूकी थी।इस वजहसे रानी को जंगल मे ही प्रसव पीडा होने लगी।राजाने जंगल मे सहारा देखना चाहा तो उसे वह जादूगरणी जगताई की झोपडी दिखायी दी।वहा पर जादूगरणी जगताई ने रानी का प्रसव करवाया, राजा को राजपूत्री हूयी पर रानी प्रसव के बाद जिंदा न रह सकी।राजा अपनी राजपूत्री को राजमहल ले गये पर वह लडकी बहोत ही कूरूप थी।राजा ने अपनी प्रतिष्ठा के बारे मे सोच कर राजपूत्री को महल के अतःपूर कैद करके नौकरोद्वारा उसका लालन पालन, खाना इ.का प्रबंध करवाया ।वह उसी अतःपूर मे बडी होती रही।पर उसे बाहर जाने आनेपर पाबंदी लगवायी गयी थी ।
पर जादूगरणी जगताई को राजपूत्री पर जन्म से ही बडा स्नेह था।वह हमेशाही उससे मिलने अपनी जादूयी टोटकोसे जाया करती थी ।उसे राजपूत्री से बडाही लगाव हो चूका था।
इधर एक दिन जादूगरणी जगताई के झोपडी के पास एक यूवक आया जिसका नाम सुयश था ।सूयश बहोत दूरके गावसे आया था।और बहूत प्यासा था।वह राजनंद राजा के राज्य मे कोई नोकरी करने की इच्छा से आया था।उसने आवाज लगाया की,"घरमे कोइ है!"तब बूढी
जादूगरणी जगताई बाहर आइ।तब सूयश ने पिनेके लीए पानी मांगा और राजधानी का रास्ता पूछने लगा।इस पर जादूगरणी ने कहा कि "राजधानी जाते-जाते तूम्हे आधी रात हो जाएगी, इसकारण तूम मेरे यहा रूक जाव और सुबह होते ही राजधानी की ओर निकल जावो।उसकी बाते सूनकर सूयश वही रूका ।जादूगरणी ने उसे बहोत अच्छा खाना खिलाया ।सूयश उसे दादी कहने लग गया उसने अपने बारे मे सब कुछ कह डाला।सूयश का दुनिया मे कोई न था।वह पढाई के बाद कूछ काम करके उदरनिर्वाह किया करता था।पर बेरोजगारी के कारन गाववालोके कहनेपर वह धन धान्य से संपन्न राजा राजनंद की राजधानी मे नौकरी करने के इरादेसे राजधानी जा रहा था ।यह बाते सूनकर जादूगरणी जगताई बोली की ,"राजधानी मे तूम नौकरी क्यूं! तूम तो राजा बनने योग्य हो,बस किसी की सेवा अथवा उपकार कभी भी न भूलना!"दूसरे दिन जब सूयश निंदसे जागा तो उसे कूछ दिखायी न दिया वह अंधा हूआ था ।तभी उसने जादूगरणी को पूकारते हूये अंधे होनेकी बात कही इसपर जादूगरणी ने उसे बताया की, "मेरि एक पोती है जो आयुर्वेद जानती है ।उसे मै बूलावूंगी तब तूम ठिक हो जावोगे तबतकआराम करो!"यह कहकर जादूगरणी जगताई वहासे निकल गयी।
जादूगरणी जगताई अपने जादूयी टोटकोसे राजपूत्रीसे मिलने राजमहलमे अतःपूर गयी।साथ मे एक पिंजरे मे तोते को भी ले गयी थी।वहा राजपूत्री को तोता बहोत पसंद आया ।राजपूत्री ने कहा कि,"दादी मूझे यह तोता दे दो मै इसके लिए सोणेका पिंजरा बनवावूंगी इसके लिए बढीया खाना दूंगी!"पर जादूगरणी ने समझाया की नही यह बंद पिंजरा इसका जिवन नही है ।सिर्फ बंद कमरा और खाना यह किसीका जीवन नही हो सकता, प्रत्येक प्राणी को स्वतंत्र जीवन आवश्यक है।और जादूगरणी ने पिंजरे से तोते को छोड दिया।वह तोता खिडकी से बाहर निकलकर स्वतंत्रतासे उडताहूवा जंगलो की और चला गया ।तोते को देख कर और जादूगरणी की बाते सूनकर राजपूत्री के मन मे भी अपने जीवन के प्रति स्वतंत्रता के विचार जाग पडे ।जल्दी ही जादूगरणी ने राजपूत्री को तोता बनाकर पिंजरे मे बंद किया और जादूसे अपनी झोपडी के पास आयी।यहा उसने तोते को फिरसे राजपूत्री बनाया।राजपूत्री को अंधे सूयश के सामने ले जाकर राजपूत्रीके हाथो मे एक लेप देकर सूयश के आखो पर लगानेको कहा।सूयश समझ रहा था कि लेप लगाकर सेवा कर रही लडकी बूढीयाकी पोती होगी ।ऐसी सेवा तीन दिन करनेके बाद सूयश ने बूढीयासे पूछा कि,यह तुम्हारी पोती कहा रहती है, उसके पिता क्या करते हैं ।इसपर बूढीयाने जवाब दिया, "मेरि पोती का मेरे सिवा और कोइ नही है।वह जंगलो मेसे औषधीया खोजती रहती है ।और जंगलो मे ही रहा करती है।इस कारन उससे शादी लायक कोइ वर भी तो नही मिला आजतक!"यह कहकर जादूगरणी चूप हूयी।पर यह सूनकर सूयश ने बूढीयासे कहा, "दादी तो फिर मै ही तुम्हारी पोती से शादी करूंगा ।उसीने मेरी इतनी सेवा की है!", "चाहे मूझे जीवन भर जंगलो मे ही रहना पडे!"
दूसरे दिन बूढीयाने अपनी जादूसे सूयश की आखे ठिक कर दी।सूयश ने यह बात बूढीयाको बतायी क्योंकी वह बूढीयाकी जादूगरणी होने की बात नही जानता था। और बूढीयाकी पोती की राह तकता रहा।जब राजकुमारी वहा आयी तो सूयश आनंदीत हूआ पर उसकी कूरूपता को देख कर वह शंका से घिर गया।पर आखिर उसने ठान ही लीया की,जिसने मेरि इतनी सेवा की, वही लडकी मेरी जिवनसंगनी बनेगी।
यह सब देख रही बूढीयाने सूयश के सामने ही मंत्र उच्चार करके राजपूत्री की कूरूपता सुंदरता मे बदल डाली।यह देख सूयश अचंबित हूआ ।फिर बूढीयाने दूसरे मंत्र उच्चार कीये तो वह तिनो राजनंद राजा के सामने जहा दरबार लगा हूआ था वहा पहूचे।
बूढीयाने राजा को उसकी वह लडकी दिखायी जो कूरूपता से अब सूंदर हो चूकी थी।राजा भी हैरान हूआ।उसने अपनी पूत्री को कूरूपता के कारण कैद रखा था इसबात पर उसे भी पश्चात्ताप हूआ।उसने सूयश और राजपूत्री का विवाह करवाया और संन्यास लेकर जंगल चला गया।सारा राजपाट अपनी पूत्री और सूयश के हाथो सौप गया।राजा के जाने के बाद जादूगरणी जगताई भी उन दोनो को आशिर्वाद देकर जंगल मे अपनी झोपडी की और चली गयी।
लेबल: उपकार और सेवा, कूरूप राजपूत्री की कथा, जादूगरणी जगताई, बोधकथा

