रविवार, २ जून, २०१९

BETAL PACHCHISI Story6 (patni kiski?)

पत्नी किसकी ? बेताल पच्चीसी

    राजा विक्रम छठी बार उस अंधेरी रात मे बेताल को लेकर योगी के पास लाने निकला ,मायावी बेताल ने फिरसे विक्रम को शर्त दिलाई की,अगर रास्ते मे तूम कूछभी बोले तो मै भाग जाउंगा, बेताल की फिरसे वही शर्त मानकर विक्रम अपने कंधेपर बेताल को उठाकर चल रहे थे। 

    बेताल ने   छठी कहानी सूनानी शूरू की,धर्मपुर में धर्मशील नाम का राजा राज करता था। उसका अनधक नाम का दीवान था। एक दिन दीवान ने कहा, “महाराज, एक मन्दिर बनवाकर देवी को बिठाकर पूजा की जाए तो बड़ा पुण्य मिलेगा!"राजा ने ऐसा ही किया। एक दिन देवी ने प्रसन्न होकर उससे वर माँगने को कहा। राजा को सन्तान नहीं थी। उसने देवी से पुत्र माँगा। देवी बोली, "अच्छी बात है, तुझे बड़ा प्रतापी पुत्र प्राप्त होगा।"कुछ दिन बाद राजा को एक लड़का हुआ। सारे नगर में बड़ी खुशी मनायी गयी।ऐसा चमत्कार सूनकर लोग भी देवीसे मंनते, प्रार्थना करने लगे।
       एक दिन एक धोबी अपने मित्र के साथ उस नगर में आया। उसकी निगाह देवी के मन्दिर में पड़ी। उसने देवी को प्रणाम करने का इरादा किया। उसी समय उसे एक लड़की दिखाई दी, जो बड़ी सुन्दर थी। उसे देखकर वह इतना पागल हो गया कि उसने मन्दिर में जाकर देवी से प्रार्थना की, "हे देवी! यह लड़की मुझे मिल जाय। अगर मिल गयी तो मैं अपना सिर चढ़ाकर मंनत पूरी कर दूँगा।" इसके बाद वह हर घड़ी बेचैन रहने लगा। उसके मित्र ने उसके पिता से सारा हाल कहा। अपने बेटे की यह हालत देखकर वह लड़की के पिता के पास गया और उसके अनुरोध करने पर दोनों का विवाह भी हो गया, मंनत पूरी हूयी। 
     विवाह के कुछ दिन बाद लड़की के पिता के यहाँ उत्सव हुआ। इसमें शामिल होने के लिए न्यौता आया। मित्र को साथ लेकर दोनों पती पत्नी चले ,रास्ते में उसी देवी का मन्दिर पड़ा तो लड़के को अपनी मंनत याद आ गयी। उसने मित्र और स्त्री को थोड़ी देर रुकने को कहा और स्वयं जाकर देवी को प्रणाम कर के इतने ज़ोर-से तलवार मारी कि उसका सिर धड़ से अलग हो गया। देर हो जाने पर जब उसका मित्र मन्दिर के अन्दर गया तो देखता क्या है कि उसके मित्र का सिर धड़ से अलग पड़ा है। उसने सोचा कि यह दुनिया बड़ी बुरी है। कोई यह तो समझेगा नहीं कि इसने अपने-आप शीश चढ़ाया है। सब यही कहेंगे कि इसकी सुन्दर स्त्री को हड़पने के लिए मैंने इसकी गर्दन काट दी। इससे कहीं मर जाना अच्छा है। यह सोच उसने तलवार लेकर अपनी गर्दन उड़ा दी।      
       उधर बाहर खड़ी-खड़ी स्त्री हैरान हो गयी तो वह मन्दिर के भीतर गयी। देखकर चकित रह गयी। सोचने लगी कि दुनिया कहेगी, यह बुरी औरत होगी, इसलिए दोनों को मार आयी इस बदनामी से मर जाना अच्छा है। यह सोच उसने तलवार उठाई और जैसे ही गर्दन पर मारनी चाही कि देवी ने प्रकट होकर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा, "मैं तुझपर प्रसन्न हूँ। जो चाहो, सो माँगो।" स्त्री बोली, "हे देवी! इन दोनों को जिला दो।" देवी ने कहा, "अच्छा, तुम दोनों के सिर मिलाकर रख दो।"   घबराहट में स्त्री ने सिर जोड़े तो गलती से एक का सिर दूसरे के धड़ पर लग गया। देवी ने दोनों को जिला दिया। 
       अब वे दोनों आपस में झगड़ने लगे। एक कहता था कि यह स्त्री मेरी है, दूसरा कहता मेरी स्त्री मेरी है।           
       बेताल बोला,     "हे राजन्! बताओ कि यह स्त्री किसकी हो?" 
      विक्रम राजा ने कहा, "नदियों में गंगा उत्तम है, पर्वतों में सुमेरु, वृक्षों में कल्पवृक्ष और अंगों में सिर। इसलिए शरीर पर पति का सिर लगा हो, वही पति होना चाहिए।" इतना सुनकर   बेताल ने कहा कि तूमने सही जवाब दिया, सचमे तूम एक न्याय प्रिय, कर्तव्यदक्ष, प्रजाहीतदक्ष और समझदार राजा हो,और इसी कारण तूम्हारा राज्य,प्रजा सुखी, संतुष्ट है,पर राजा विक्रम तूम तो मेरी शर्त हार चूके क्योंकी तूम्हे न बोलनेकी शर्त रखी गयी थी सो मै तो अब चला! ऐसा कहकर बेताल  उडने लगा और पेडपर जा लटक गया. 

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शनिवार, २७ एप्रिल, २०१९

वरूथिनी एकादशी की कथा varuthini ekadashi


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वरूथिनी एकादशी की कथा

varuthini ekadashi katha (hindi)



वरूथिनी एकादशी



 वरूथिनी एकादशी की कथा पद्मपूराण मे आती है। जब धर्मराज यूधिष्ठीरने भगवान श्री कृष्णसे एकादशी व्रतोँ का महात्म्य ,विधी और इन व्रतों को करनेसे मिलनेवाले पूण्य के बारेमे जानने की बिनतिपूर्वक प्रार्थना की।तब भगवान कृष्ण ने एकादशी व्रतोंका  महात्म्य बताया।जिसमेसे वैशाख के कृष्णपक्ष की एकादशी वरूथिनी के नाम से प्रसिद्ध है। यह इस लोक और परलोक में भी सौभाग्य प्रदान करने वाली है। वरूथिनी के व्रत से सदा सौख्य का लाभ तथा पाप की हानि होती है। यह सबको भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी है।
          व्रती को चाहिए कि वह व्रत रखने से एक दिन पूर्व हविष्यान्न का एक बार भोजन करे। इस व्रत में कुछ वस्तुओं का पूर्णतया निषेध है, अत: इनका त्याग करना ही श्रेयस्कर है। व्रत रहने वाले के लिए उस दिन पान खाना, दातून करना, परनिन्दा, क्रोध करना, असत्य बोलना वर्जित है। इस दिन जुआ और निद्रा का भी त्याग करें। इस व्रत में तेलयुक्त भोजन नहीं करना चाहिए। रात्रि में भगवान का नाम स्मरण करते हुए जागरण करें और द्वादशी को माँस, कांस्यादि का परित्याग करके व्रत का पालन करे।

  कहानी
  प्राचीन काल में नर्मदा के तट पर मांधाता राजा का राज्य था। एक दिन जब वह जंगल में तपस्या कर रहा था, तभी एक जंगली भालू आया और राजा का पैर चबाने लगा। राजा पूर्ववत अपनी तपस्या में लीन रहा। कुछ देर बाद पैर चबाते-चबाते भालू राजा को घसीटकर पास के जंगल में ले गया। राजा बहुत घबराया, मगर धर्म अनुकूल उसने क्रोध और हिंसा न करके भगवान विष्णुसे प्रार्थना की, करुण भाव से भगवान विष्णु को पुकारा। उसकी पुकार सुनकर भक्तवत्सल भगवान श्री विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने चक्र से भालू को मार डाला। राजा का पैर भालू पहले ही खा चुका था। इससे राजा बहुत ही शोकाकुल हुआ। उसे दुखी देखकर भगवान विष्णु बोले " हे वत्स! शोक मत करो। वरुथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरे वराह अवतार की पूजा करो। उसके प्रभाव से तूम पुन: सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे। इस भालू ने तुम्हें जो काटा है, यह तुम्हारे पूर्व जन्म का अपराध था।" भगवान की आज्ञा मान राजा ने श्रद्धापूर्वक इस व्रत को किया। इसके प्रभाव से वह शीघ्र ही पुन:  संपूर्ण अंगों वाला हो गया।

      ऐसी मान्यता है कि इस एकादशी का फल सभी एकादशियों से बढ़कर है। धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि अन्न दान और कन्या दान का महत्त्व हर दान से ज़्यादा है और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखने वाले को इन दोनों के योग के बराबर फल प्राप्त होता है। इस दिन जो पूर्ण उपवास रखनेसे दस हज़ार वर्षों की तपस्या के बराबर फल प्राप्त होता है। उसके सारे पाप धुल जाते हैं। जीवन सुख-सौभाग्य से भर जाता है। मनुष्य को भौतिक सुख तो प्राप्त होते ही हैं, मृत्यु के बाद वह मोक्ष को भी प्राप्त हो जाता है

       इस प्रकार एकादशी का व्रत किया जाता है। इस एकादशी की रात्रि में जागरण करके भगवान मधुसूदन का पूजन करने से व्यक्ति सब पापों से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त होता है। मानव को इस पतितपावनीएकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस व्रत के माहात्म्य को पढने अथवा सुनने से भी पुण्य प्राप्त होता है। वरूथिनीएकादशी के अनुष्ठान से मनुष्य सब पापों से मुक्ति पाकर वैकुण्ठ में प्रतिष्ठित होता है। जो लोग एकादशी का व्रत करने में असमर्थ हों, वे इस तिथि में अन्न का सेवन कदापि न करें। वरूथिनी एकादशी महाप्रभु वल्लभाचार्यकी भी जयंती-तिथि है। पुष्टिमार्गीयवैष्णवों के लिये यह दिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वे इस तिथि में श्रीवल्लभाचार्यका जन्मोत्सव मनाते हैं।

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