बोध पर कथा

विष्णु के अवतार यानी मर्यादा पुरुषोत्तम के रुप में ज्ञानी, तेजस्वी और पराक्रमी पुत्र का जन्म हुआ जो तिथी चैत्र नवमी के दिन दोपहर की है।दीनों पर दया करने वाले, कौसल्याजी के हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट हुए। मुनियों के मन को हरने वाले श्री हरी विष्णू के अद्भुत रूप का विचार करके माता हर्ष से भर गई।

रविवार, २ जून, २०१९

BETAL PACHCHISI Story6 (patni kiski?)

पत्नी किसकी ? बेताल पच्चीसी

    राजा विक्रम छठी बार उस अंधेरी रात मे बेताल को लेकर योगी के पास लाने निकला ,मायावी बेताल ने फिरसे विक्रम को शर्त दिलाई की,अगर रास्ते मे तूम कूछभी बोले तो मै भाग जाउंगा, बेताल की फिरसे वही शर्त मानकर विक्रम अपने कंधेपर बेताल को उठाकर चल रहे थे। 

    बेताल ने   छठी कहानी सूनानी शूरू की,धर्मपुर में धर्मशील नाम का राजा राज करता था। उसका अनधक नाम का दीवान था। एक दिन दीवान ने कहा, “महाराज, एक मन्दिर बनवाकर देवी को बिठाकर पूजा की जाए तो बड़ा पुण्य मिलेगा!"राजा ने ऐसा ही किया। एक दिन देवी ने प्रसन्न होकर उससे वर माँगने को कहा। राजा को सन्तान नहीं थी। उसने देवी से पुत्र माँगा। देवी बोली, "अच्छी बात है, तुझे बड़ा प्रतापी पुत्र प्राप्त होगा।"कुछ दिन बाद राजा को एक लड़का हुआ। सारे नगर में बड़ी खुशी मनायी गयी।ऐसा चमत्कार सूनकर लोग भी देवीसे मंनते, प्रार्थना करने लगे।
       एक दिन एक धोबी अपने मित्र के साथ उस नगर में आया। उसकी निगाह देवी के मन्दिर में पड़ी। उसने देवी को प्रणाम करने का इरादा किया। उसी समय उसे एक लड़की दिखाई दी, जो बड़ी सुन्दर थी। उसे देखकर वह इतना पागल हो गया कि उसने मन्दिर में जाकर देवी से प्रार्थना की, "हे देवी! यह लड़की मुझे मिल जाय। अगर मिल गयी तो मैं अपना सिर चढ़ाकर मंनत पूरी कर दूँगा।" इसके बाद वह हर घड़ी बेचैन रहने लगा। उसके मित्र ने उसके पिता से सारा हाल कहा। अपने बेटे की यह हालत देखकर वह लड़की के पिता के पास गया और उसके अनुरोध करने पर दोनों का विवाह भी हो गया, मंनत पूरी हूयी। 
     विवाह के कुछ दिन बाद लड़की के पिता के यहाँ उत्सव हुआ। इसमें शामिल होने के लिए न्यौता आया। मित्र को साथ लेकर दोनों पती पत्नी चले ,रास्ते में उसी देवी का मन्दिर पड़ा तो लड़के को अपनी मंनत याद आ गयी। उसने मित्र और स्त्री को थोड़ी देर रुकने को कहा और स्वयं जाकर देवी को प्रणाम कर के इतने ज़ोर-से तलवार मारी कि उसका सिर धड़ से अलग हो गया। देर हो जाने पर जब उसका मित्र मन्दिर के अन्दर गया तो देखता क्या है कि उसके मित्र का सिर धड़ से अलग पड़ा है। उसने सोचा कि यह दुनिया बड़ी बुरी है। कोई यह तो समझेगा नहीं कि इसने अपने-आप शीश चढ़ाया है। सब यही कहेंगे कि इसकी सुन्दर स्त्री को हड़पने के लिए मैंने इसकी गर्दन काट दी। इससे कहीं मर जाना अच्छा है। यह सोच उसने तलवार लेकर अपनी गर्दन उड़ा दी।      
       उधर बाहर खड़ी-खड़ी स्त्री हैरान हो गयी तो वह मन्दिर के भीतर गयी। देखकर चकित रह गयी। सोचने लगी कि दुनिया कहेगी, यह बुरी औरत होगी, इसलिए दोनों को मार आयी इस बदनामी से मर जाना अच्छा है। यह सोच उसने तलवार उठाई और जैसे ही गर्दन पर मारनी चाही कि देवी ने प्रकट होकर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा, "मैं तुझपर प्रसन्न हूँ। जो चाहो, सो माँगो।" स्त्री बोली, "हे देवी! इन दोनों को जिला दो।" देवी ने कहा, "अच्छा, तुम दोनों के सिर मिलाकर रख दो।"   घबराहट में स्त्री ने सिर जोड़े तो गलती से एक का सिर दूसरे के धड़ पर लग गया। देवी ने दोनों को जिला दिया। 
       अब वे दोनों आपस में झगड़ने लगे। एक कहता था कि यह स्त्री मेरी है, दूसरा कहता मेरी स्त्री मेरी है।           
       बेताल बोला,     "हे राजन्! बताओ कि यह स्त्री किसकी हो?" 
      विक्रम राजा ने कहा, "नदियों में गंगा उत्तम है, पर्वतों में सुमेरु, वृक्षों में कल्पवृक्ष और अंगों में सिर। इसलिए शरीर पर पति का सिर लगा हो, वही पति होना चाहिए।" इतना सुनकर   बेताल ने कहा कि तूमने सही जवाब दिया, सचमे तूम एक न्याय प्रिय, कर्तव्यदक्ष, प्रजाहीतदक्ष और समझदार राजा हो,और इसी कारण तूम्हारा राज्य,प्रजा सुखी, संतुष्ट है,पर राजा विक्रम तूम तो मेरी शर्त हार चूके क्योंकी तूम्हे न बोलनेकी शर्त रखी गयी थी सो मै तो अब चला! ऐसा कहकर बेताल  उडने लगा और पेडपर जा लटक गया. 

अन्य कहाणीयाँ,
https://kathabharatindia.blogspot.com/2019/03/Vikram-betal-katha.html

 https://kathabharatindia.blogspot.com/2019/03/Bodh-katha-bhartiya.html

लेबल: पत्नी किसकी ?, बेताल पच्चीसी, वरूथिनी एकादशी, विक्रम बेताल, baital pachchisi, stories, Vikram betal

Arjun Dhotre द्वारा पोस्ट केलेले @ जून ०२, २०१९   0 टिप्पण्या

सोमवार, ८ एप्रिल, २०१९

विक्रम- बेताल कहानी :प्रतिष्ठा हिन राजपुत्र



विक्रम- बेताल कहानी :प्रतिष्ठा हिन राजपुत्र 

     विक्रम राजा फिरसे बेताल को पेडपरसे निकाल कर अपने कन्धोपर लेकर उस भयानक जन्गलसे रातके समय मे चल रहे थे।तभी बेताल बोला,"विक्रम तुम अपना हठ अबतक न छोड़ सके।अब तुम्हें क्या समझाना तुम तो श्रेष्ठो मे गिनेजाते हो।पर कई बार श्रेष्ठोके भी कामोसे उन्हें हासिल इनामों से वन्चित रखा गया है!चलो इसकी एक कहानी ही सुन लो।

       विजयनगर में जब शिवसेन का राज्य था तब उसे एकहि कन्या हुई जिसका नाम सूर्यमुखी था।वह युद्ध कला में बहुत ही निपुण थी।इस कारण राजाने सोचा की ,कुछ समय तक सूर्यमुखी को ही सिहासन पर बिठाया जाएं।इसके बाद ही उसका विवाह करेंगे।
        राजा ने सूर्यमुखी का राजतिलक कर दिया।सूर्यमुखी ने भी अच्छे से राज्य कारभार कर दिखाया।अब राजा ने उसके विवाह की बात कही कि,"बेटी अब तुम विवाह योग्य हो मैं तुम्हारे लिए योग्य वर खोजता हूँ !"
        इसपर सूर्यमुखी ने कहा ,"ठीक है पिताजी पर मेरा वर वही बनेगा जो मुझे तलवार युद्ध में पराजित करेंगा"।
         राजा ने बाकी राज्यों में यह सूचना कर दि,जो कोई राजा अथवा राजपुत्र सूर्यमुखी को तलवार युद्ध में हराएगा उसिसे वह विवाह करेंगी।यह सूचना पाकर अनेकों राजा एवं राजपुत्र विजयनगर विवाह की इच्छा से आये।पर तलवार युद्ध मे वे सूर्यमुखी को हरा न सके।
          अब दूर दूर के राज्यों में सूर्यमुखी के विवाह तथा उसके तलवार चलाने के महारथ की चर्चाएं होनी लगी थी।
           यही चर्चा सुनकर किसी राज्य का राजपुत्र जयवन्त भी विजयनगर पहुंचा।वह तलवार चलाने में माहिर था।उसने भेस बदलकर बहोत दिनों तक सूर्यमुखी की तलवार बाजी देखी।उनके तलवार चलाने के पेच देख लिये।
          जब सूर्यमुखी नये पेच चला कर सामने वाले को हरा देती तब जयवन्त खुश होकर तालियाँ बजाया करता था।एक दिन उसे सूर्यमुखी ने देखा की यह किसी राजघराने से होगा ।क्यों की उसकी चमक एवं रहन सहन ही वैसी थी।
           एक दिन जयवन्त ही असली रूप में सूर्यमुखी केसाथ तलवार बाजी करने मैदान में उतरा और देखते ही देखते उसने सूर्यमुखी को हरा दिया।
           परन्तु सूर्यमुखी ने उसके साथ विवाह करनेसे इन्कार कर दिया।जयवन्त ने भी उलटा उसके ही आभार व्यक्त किये, एवं अपने राज्य को चला गया।"
             यह कहानी सुनाकर बेताल ने पुछा,"अब तुम बतावो कि,वह राजपुत्री सूर्यमुखी तो अपने गर्व के कारण उसने उस श्रेष्ठ को अपमानित ही किया!"

             "परन्तु वह राजपुत्र जयवन्त भी आत्म प्रतिष्ठा हिन था,जिसने अपना इनाम तक छोड़ा?"
              विक्रम बोला  "नहीं! जब जयवन्त वहां बैठे अनेको पेच सीखता रहा , यह बात सूर्यमुखी जानचुकि थी ।वही बात जयवन्त भी समझ गया ।उन दोनों का रिश्ता गुरु शिष्य का हुआ।

राजपुत्री ने गर्व नहि किया है।राजपुत्र भी प्रतिष्ठा वान था,जिसने पेच सिख लिए थे।"
                उत्तर सुनतेहि राजा विक्रम की न बोलने वाली शर्त इसबार भी तोडनेमे यशस्वी बेताल फिरसे भाग गया।
ReplyForward

लेबल: कथाए, कहहानी, पौराणिक, विक्रम और बेताल, HINDI STORY, Vikram betal

Arjun Dhotre द्वारा पोस्ट केलेले @ एप्रिल ०८, २०१९   0 टिप्पण्या

मंगळवार, ५ फेब्रुवारी, २०१९

विक्रम वेताळ

  

 Vikram betal 

विक्रम वेताळ 

विक्रम वेताळ की कथा के सोमदेवजी लेखक है और ये पूरी पच्चीस कथा है|
राजा विक्रम उज्जैन देश का राजा था वो एक योगी के कहने पर बेताल को मसान में स्थित पीपल के पेड़ से उतारकर योगी के पास लाने के लिए जाता था लेकिन बेताल भी कम चालाक नहीं था। वो बार-बार राजा के बंधन से छूट और राजा को शर्त हराकर वापस पेड़ पर जा लटकता था।फिर से राजा बेताल को पकडकर लाता ।
       यह कथा विस्तृत देखे तो राजा विक्रम एक न्याय प्रिय,सत्यवादी,प्रजाहीतदक्ष था।एकबार एक योगी मनुष्य के सेवा करनेहेतू अथवा उसके कहे नुसार मसान के रास्ते जंगल मे रात के समय बडे पिपल के वृक्ष पर से एक टंगाहूआ कलेवर लाने को कहा गया।
    विक्रम अपने हात मे तलवार लिए रात के समय चल दिये।जंगल मे भयानक अंधेरा था।कही समसान तो कही बहोत भयावह आवाजे आ रही थी।पैरो परसे साप भी टकराते रहे थे
पर इनचीजोसे बेडर राजा विक्रम अपना काम करने जंगल की ओर चल रहे थे।विक्रम ने बडे बरगत पेड पर वह कलेवर (बेताल)देख कर उसे उतारना चाहा,उतारतेही अपने शक्तीयोसे वह बेताल पलक झपकतेही पहले जैसा बरगद पर टंग गया राजा हैरान हूआ।फिर से प्रयत्न करतेही बेताल हंसने लगा।निडर राजा विक्रम ने बेताल से मेरे कंधेपर बैठकर योगी के पास चलने की बात कही और बेताल ने भी अगर चलते समय मेरी बाते सूननेऔर रास्ते मे कुछ भी न बोलने की शर्त  कही।ये बात सूनकर विक्रम अपने कंधेपर बेताल को उठाकर चलने लगे ।

   बेताल ने राजा की खूशहाली पूछी, साथ उसके राज्य का हाल पूछा और राजा विक्रम को न्याय की बाते कही,इस पर अपने मूह से कूछ भी न बोलते हूये राजा चल रहे थे।
   राजा की न बोलनेवाली शर्त तोडनेके लिए चालाक बेताल ने फीर एक राजपूत्र की कहानी सूनानी शूरू कि
    प्रतापमूकूट राजा का राजपूत्र वज्रमूकूट जीनका राज्य काशी था।एक दिन राजपूत्र वज्रमूकूट अपने मित्र जो दिवान का पूत्र था।इसके साथ शिकारपर गया बहोत घने जंगलो के  बाद वे दोनो तालाब के पास रूके जलपान करके घोडोंको बांध कर वह दोनो पास के महादेव मंदीर गये दर्शन करके जब घोडो की और आने लगे तो तालाब के एक और राजकन्या सहेलियों के साथ आती  दिखी |

      राजकन्या का सौंदर्य देख कर वज्रमूकूट से रहा न गया वह अपने मित्र को वहा छोड कर उस राजकन्या की ओर आया और उसपर मोहीत हूआ।सहेलियोके कारन राजकन्या कूछ बोली तो नही. पर उसे भी वज्रमूकूट पसंद आया वह भी वज्रमूकूट की ओर देखती रह गयी |वज्रमूकूट ने मनही मन उसे अपना बनाना चाहा ,जाते समय राजकन्या ने वज्रमूकूट की ओर देखते हूये एक कमल का फूल तोडकर अपने कान से लगाया ,दातों से चभाया,पैरो के निचे दबाया और फीर अपने सिनेसे लगाया और राजकन्या सहेलियोंके साथ चलिगई |
  उसके बाद वज्रमूकूट ने जब मित्रके पास आकर अपनी प्रेम की बात और राजकन्या के इशारोंकी बात कही तो मित्र ने उसीसे शादी करने की सलाह दी।वज्रमूकूट हैरानसा हुआ क्युकी वह राजकुमारी कहा गई. पर वह दिवान का लडका राजकुमारीने करे एशरोंको समज चुका था. वह बाते उसने वज्रमूकूट को समझायी की,
1.राजकुमारीने कमल कान को लगाया......तो वह कर्नाटक राज्य से है.
2.उसने अपने दातों से चभाया....तो दंतावट राजा जो कर्नाटक राज्य के है ये राजकन्या वहा से ही है.
3.रही पैरोतले कमल दाबाने की बात.......तो शतप्रतीशत कन्या का नाम पद से पद्मावती है.

    वज्रमूकूट यह बाते जाणकर आनंदीत हुआ और उसने कहा की मै अब उस राजकन्या पद्मावती के बिना नही रह पाउंगा .मै उससे शादी करूंगा और पद्मावती को काशी राज्य की महाराणी बनाउंगा,उसके बाद वो दोनो महत्वाकांक्षी युवक कर्नाटक  देेेश की ओर रवाना हूये, कइ दिनो बाद जब वे कर्नाटक पहूूचे तो उन्होने सबसेे पहेेले  वहा रहनेेकी व्यवस्था की  ,वे एक बुढी औरत के घर रहने लगे,जीसे उन्होने  हम सौदागर है और यहा व्यापार करने की राजा से अनुुुमती लेना चाहते है ऐसा कहा ,
    बुढी औरत ने मै पहले राजपूत्री पद्मावती की धाई थी,और आजभी मै रोजाना रज्महल जाती हू,हमारे राजा,और राज्य बहुत अच्छा है और यहा आप बहोत अच्छा महसूस करोगे ऐसा कहा.
     यह जानकर राजपूत्र वज्रमूकूट  ने बूढी औरत को कूछ धन देकर, राजपूत्री पद्मावती को अपना संदेश कहनेको कहा
बूढी औरत मान गई. दूसरे दिन वह राजमहल गई,राजपूत्री से कहा की,तुम्हे जो राजपूत्र तालाब के पास पंचमी के दिन मिला था वह तुम्हे मिलने अब यहा आया है।
   यह सूनकर राजपूत्रीने अपने दोन हात चंदन मे डूबोकर बूढीयाके दोनो गालोपर तमाचे मार दिये. 
   जब बूढीया घर आइ तो बूढीयाने वज्रमूकूट को सारा हाल सूनाया, वज्रमूकूट हैरान हूआ, पर उसके मित्र ने तमाचे मारनेका मतलब ऐसा समझाया की,ये जो चंदन से रंगी दस उंगलीया बूढीयाके गालोपर दिखरही है वह संकेत है की अभी दस दिन चांदनी राते रहेंगी. तो उसके बादअंधेरी रात मे वह तूमसे मिल सकती है, इसका मतलब यह भी हूआ की राजपूत्री पद्मावती अंधेरी रात मे तूम्हारे साथ भाग सकती है,ऐसा संदेश है
.   दस दिन बाद जब फारसे वज्रमूकूट ने बूढीयाको राजपूत्री को संदेश भेजा की वह कब मिल सकेगी तो राजपूत्रीने केशरी रंग के चंदनसे तीन ही उंगलीयोसे बूढीयाके गालोपर तमाचा मारा,बूढीयाने घर आकर वज्रमूकूट से सारा हाल सूनाया, उसपर वज्रमूकूट के मित्र ने इस संदेश को समझाया की, ये तीन उंगलीया और केशरी रंग प्रतिक है की राजपूत्री मासिक धर्म के कारण तीन दिन नही मील सकती.
     अब तीन दिन बाद जब फिरसे बूढीयाको भेजा गया तो अबकी बार राजपूत्री पद्मावती ने बूढीयाको पश्चिम दिशा की ओर जो खिडकी थी उस खिडकी मेसे बूढीयाको उतार भगाया. 
बूढीयाने यह हाल भी वज्रमूकूट को घर आकर सूनाया,उसपर वज्रमूकूट के मित्र ने समझाया की,आज राजपूत्रीपद्मावती तूम्हे   रात के समय उस पश्चिम दिशा की ओर वाली खिडकी मेसे बूलाएगी. 
     उस रात राजपूत्र वज्रमूकूट बूढीयाका भेस बनाकर राजमहल छूपकर पहूचा और उस खिडकी से अंदर घुसा वहा राजपूत्रीपद्मावती उसका इंतजार ही कर रही थी,उसने वज्रमूकूट को छूपकेसे अपने कक्ष मे ले गयी, उनकी वहा बहोत सारी बाते हूयी ,ऐसे छूपकर राजपूत्र वज्रमूकूट बहूत सारे दिन राजपूत्री के साथ रहे,राजपूत्री और राजपूत्र का प्रेम बढताही रहा.
   पर एक दिन राजपूत्र वज्रमूकूट को अपने उस मित्र की याद आयी राजपूत्र हैरान हूआ की मेरे मित्र का क्या हूआ होगा, इस पराये देश मे, उसने यह बात पद्मावती से भी कही की मेरे मित्र से मूझे मिलने जाना होगा, उसका हाल देखना होगा,वह मित्र मूझे बहूत ही प्रिय है,उसीकी चतूराई और समझदारी के कारणही हमारा मिलन हूआ है मै कल उसे मिलने जाता हू.
     दुसरे दिन जब छूपकेसे वज्रमूकूट निकल्ने लगा तो राजपूत्री ने वज्रमूकूट के मित्र के लिए साथमे भोजन दिया और कहा की जब आप अपने मित्र से इतनाही प्रेम करते है तो यह भोजन उसे मेरी तरफसे जरूर खीलाना, उसके बाद वज्रमूकूट निकल गया. 
    जब वज्रमूकूट अपने मित्र से मिला तो,दोनो ने बहोत सारी बाते की,अपने अपने घटीत हाल कहे,राजपूत्र ने अपना और राजपूत्री पद्मावती की प्रेम कथा का विवरण कहा,और पद्मावती की तरफसे भेजे भोजन का भी सविस्तर विवरण कथन किया.
     उसके बाद वज्रमूकूट ने वह भोजन अपने मित्र को खानेको कहा,पर मित्र ने वज्रमूकूट से कहा की इसमे तो जहर है,वज्रमूकूट ने एसा कभी भी नहीं हो सकता ऐसे विचार पद्मावती नही करेंगी ऐसा कहा,फिर मित्र ने वज्रमूकूट को विश्वास करने खातीर व खाना एक कूत्ते को डाला जो खाने के बाद मर गया,यह देख वज्रमूकूट बहोत परेशान हूआ, पर उसके मित्र ने समझाया की,जब तुमने पद्मावती से कहां की तूम अपने मित्र से बहूत प्रेम करते हो,तो उसने सोचा की अगर वज्रमूकूट का मित्र हि नही रहेगा तो वज्रमूकूट सिर्फ मूझसेही प्रेम रखेगा,ऐसे विचारोसे उसने मुझे मारने के लिए यह भोजन तूम्हारे हाथो भेजा,ताकी इसे खाकर मै मर जाऊ यह बात सूनकर राजपूत्र वज्रमूकूट को बहोत बूरा लगा. 
   वज्रमूकूट के मित्र ने वज्रमूकूट को सलाह दि की हमे उस राजकन्या को हर हाल अपने राज्य ले जाना चाहीये और इस काम के लिए एक तरकीब मै तूम्हे बताता हू,उनकी बातचीत के बाद.
   मित्र ने वज्रमूकूट को चुपचाप राजमहल जाकर राजपूत्री पद्मावती जब सोइ हो तब चुपचाप उसके गहने निकाल लाने और उसके बाइ जाघ पर एक त्रिशूल का निशान बनानेको कहा,वज्रमूकूट तैयार हूआ और करके आया, अब इस मित्र ने योगी का भेस बनाया  और लाए हूये गहने यहा बाजारमे बेचने भेजा,कोइ अगर राजपूत्रीके गहने पहचानकर तूम्हे पकडे तो बोल देना ये गहने मेरे गुरूने दिये है,जैसे वज्रमूकूट गहने बेचने बाजार गया और एक सुनार को वह गहने दिखाए तो सूनारने वह राजकुमारीके गहने यह पहचानकर वज्रमूकूट को गहनोसहीत कोतवाल के हाथो सोपा.उसके बाद ये बात राजा के सामने गई,वज्रमूकूट पर राजपूत्रीके गहने चूरानेका आरोप लगवाया गया,पर वज्रमूकूट ने कह दिया की यह गहने मूझे मेरे गुरूने दिये है,मै चोर नही हू. इसके बाद योगी का भेसपहने मित्र को राजा के सामने लाया गया ,तो राजा ने आदरसे कहा की ,हे योगी आपको यह गहने कहां मिले.?तो योगी बने मित्र ने राजा को जवाब दिया की ये गहने मूझे एक डाकिनीने दिये है,काली चौदस को जब मैने साधना की,तो डाकीनी आयी,उसीने यह गहने मूझे दिये और मैने उसकी बायी जाघ पर एक त्रिशूल का निशान भी बनवाया था.
    उसके बाद जब राजा राजमहलमे आए तो उन्होने रानीसे राजपूत्री के जांघोपर त्रिशूल का निशान देख आनेको कहा,राणीने देखा,तो सही में निशान था राजा को बड़ा दु:ख हुआ, बाहर आकर वह योगी को एक ओर ले जाकर बोला, “महाराज, धर्मशास्त्र में खोटी स्त्रियों के लिए क्या दण्ड हो सकता है?”
योगी ने जवाब दिया, “राजा, गऊ, स्त्री, लड़का और अपने आसरे में रहनेवाले से खोटा काम हो जाये ,तो उसे देश-निकाला दे देना चाहिए” यह सुनकर राजा ने पद्मावती को सैनिको सह जंगल में छुड़वा दिया,पद्मावती को अकेले देख वज्रमूकूट और उसके मित्र ने पद्मावती को अपने साथ काशी राज्य चलने को कहा ,और फ़िर वह तीनो काशी रवाना हूये. 
        यह कथा सूनाने के बाद बेताल ने राजा विक्रम से सवाल किया की ,इस कथा मे पाप कीसे लगा?
        राजा विक्रम ने जवाब दिया ,मित्र ने अपने स्वामी वज्रमूकूट की सेवा की,कोतवाल ने राजा की,वज्रमूकूट ने अपना मनोरथ साध्य किया,तो फिर केवल राजा जिसने बिना विचार करे जो अपनी कन्या को जंगल छोडा उसी राजा को पाप लगा.
             बेताल ने कहा कि तूमने सही जवाब दिया, सचमे तूम एक न्याय प्रिय, कर्तव्यदक्ष, प्रजाहीतदक्ष और समझदार राजा हो,और इसी कारण तूम्हारा राज्य,प्रजा सुखी, संतुष्ट है,पर राजा विक्रम तूम तो मेरी शर्त हार चूके क्योंकी तूम्हे न बोलनेकी शर्त रखी गयी थी सो मै तो अब चला! ऐसा कहकर बेताल  उडने लगा और बरगद के पेडपर जा लटक गया.

लेबल: राजा विक्रमादित्य, विक्रम और वेताळ, Vikram betal

Arjun Dhotre द्वारा पोस्ट केलेले @ फेब्रुवारी ०५, २०१९   0 टिप्पण्या

माझ्याबद्दल

माझे फोटो
नाव: Arjun Dhotre
स्थान: India

माझे पूर्ण प्रोफाइल पहा.

लिंक

  • Google News
  • Edit-Me
  • Edit-Me

मागील पोस्ट्स

  • श्री नवनाथ स्तोत्र
  • कानिफनाथ आरती
  •  अध्याय २. कथासारमच्छिंद्रनाथास दत्तात्रेय व शंकरा...
  • संतोषी माता व्रत कथा मराठी
  • श्री दत्तात्रेय स्तोत्र
  • तुमच्याआहारात सूकामेवा समावेश करणे हे अन्न खाण्याइ...
  • विक्रम बेताल कथा
  • भगवान श्री राम का जन्म (रामनवमी)
  • देवी माँ
  • BETAL PACHCHISI last story 25th

संग्रहण

  • फेब्रुवारी 2019
  • मार्च 2019
  • एप्रिल 2019
  • मे 2019
  • जून 2019
  • मार्च 2020
  • मे 2022
  • जून 2022

Powered by Blogger

याची सदस्यत्व घ्या
टिप्पण्या [Atom]