बोध पर कथा

विष्णु के अवतार यानी मर्यादा पुरुषोत्तम के रुप में ज्ञानी, तेजस्वी और पराक्रमी पुत्र का जन्म हुआ जो तिथी चैत्र नवमी के दिन दोपहर की है।दीनों पर दया करने वाले, कौसल्याजी के हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट हुए। मुनियों के मन को हरने वाले श्री हरी विष्णू के अद्भुत रूप का विचार करके माता हर्ष से भर गई।

सोमवार, ८ एप्रिल, २०१९

विक्रम- बेताल कहानी :प्रतिष्ठा हिन राजपुत्र



विक्रम- बेताल कहानी :प्रतिष्ठा हिन राजपुत्र 

     विक्रम राजा फिरसे बेताल को पेडपरसे निकाल कर अपने कन्धोपर लेकर उस भयानक जन्गलसे रातके समय मे चल रहे थे।तभी बेताल बोला,"विक्रम तुम अपना हठ अबतक न छोड़ सके।अब तुम्हें क्या समझाना तुम तो श्रेष्ठो मे गिनेजाते हो।पर कई बार श्रेष्ठोके भी कामोसे उन्हें हासिल इनामों से वन्चित रखा गया है!चलो इसकी एक कहानी ही सुन लो।

       विजयनगर में जब शिवसेन का राज्य था तब उसे एकहि कन्या हुई जिसका नाम सूर्यमुखी था।वह युद्ध कला में बहुत ही निपुण थी।इस कारण राजाने सोचा की ,कुछ समय तक सूर्यमुखी को ही सिहासन पर बिठाया जाएं।इसके बाद ही उसका विवाह करेंगे।
        राजा ने सूर्यमुखी का राजतिलक कर दिया।सूर्यमुखी ने भी अच्छे से राज्य कारभार कर दिखाया।अब राजा ने उसके विवाह की बात कही कि,"बेटी अब तुम विवाह योग्य हो मैं तुम्हारे लिए योग्य वर खोजता हूँ !"
        इसपर सूर्यमुखी ने कहा ,"ठीक है पिताजी पर मेरा वर वही बनेगा जो मुझे तलवार युद्ध में पराजित करेंगा"।
         राजा ने बाकी राज्यों में यह सूचना कर दि,जो कोई राजा अथवा राजपुत्र सूर्यमुखी को तलवार युद्ध में हराएगा उसिसे वह विवाह करेंगी।यह सूचना पाकर अनेकों राजा एवं राजपुत्र विजयनगर विवाह की इच्छा से आये।पर तलवार युद्ध मे वे सूर्यमुखी को हरा न सके।
          अब दूर दूर के राज्यों में सूर्यमुखी के विवाह तथा उसके तलवार चलाने के महारथ की चर्चाएं होनी लगी थी।
           यही चर्चा सुनकर किसी राज्य का राजपुत्र जयवन्त भी विजयनगर पहुंचा।वह तलवार चलाने में माहिर था।उसने भेस बदलकर बहोत दिनों तक सूर्यमुखी की तलवार बाजी देखी।उनके तलवार चलाने के पेच देख लिये।
          जब सूर्यमुखी नये पेच चला कर सामने वाले को हरा देती तब जयवन्त खुश होकर तालियाँ बजाया करता था।एक दिन उसे सूर्यमुखी ने देखा की यह किसी राजघराने से होगा ।क्यों की उसकी चमक एवं रहन सहन ही वैसी थी।
           एक दिन जयवन्त ही असली रूप में सूर्यमुखी केसाथ तलवार बाजी करने मैदान में उतरा और देखते ही देखते उसने सूर्यमुखी को हरा दिया।
           परन्तु सूर्यमुखी ने उसके साथ विवाह करनेसे इन्कार कर दिया।जयवन्त ने भी उलटा उसके ही आभार व्यक्त किये, एवं अपने राज्य को चला गया।"
             यह कहानी सुनाकर बेताल ने पुछा,"अब तुम बतावो कि,वह राजपुत्री सूर्यमुखी तो अपने गर्व के कारण उसने उस श्रेष्ठ को अपमानित ही किया!"

             "परन्तु वह राजपुत्र जयवन्त भी आत्म प्रतिष्ठा हिन था,जिसने अपना इनाम तक छोड़ा?"
              विक्रम बोला  "नहीं! जब जयवन्त वहां बैठे अनेको पेच सीखता रहा , यह बात सूर्यमुखी जानचुकि थी ।वही बात जयवन्त भी समझ गया ।उन दोनों का रिश्ता गुरु शिष्य का हुआ।

राजपुत्री ने गर्व नहि किया है।राजपुत्र भी प्रतिष्ठा वान था,जिसने पेच सिख लिए थे।"
                उत्तर सुनतेहि राजा विक्रम की न बोलने वाली शर्त इसबार भी तोडनेमे यशस्वी बेताल फिरसे भाग गया।
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लेबल: कथाए, कहहानी, पौराणिक, विक्रम और बेताल, HINDI STORY, Vikram betal

Arjun Dhotre द्वारा पोस्ट केलेले @ एप्रिल ०८, २०१९   0 टिप्पण्या

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